Monday, 14 May 2018

एष धर्मः सनातनः - 10 - प्रत्यक्ष भगवान के प्रमाण


(ग्रन्थ- “एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. ३५)

            आंखों को दिखने वाले महाजलों से खेती-बाड़ी करके फसल उगाने की जानकारी और छोटे से पेड़ों के मूल से दवाई की उत्पत्ति कैसे हो, इसका ज्ञान पाना- यह सब विज्ञान है। इसी प्रकार प्रकृति की शक्ति में स्थित एक प्राणवान चैतन्य की स्फूर्ति को, दैविक प्रकाश को पहचान कर उसको स्पंदित करवाने वाला जो एक विज्ञान है, वह है देवता विज्ञान। यह भौतिकता से परे सूक्ष्म ज्ञान है।
            प्राचीन भारतीय महर्षियों ने सौरशक्ति में छुपे हुए उस दैविक चैतन्य को ग्रहण करने की विधि को विविध पद्धतियों में बोधित किया। इस भूमि पर स्थित हर अणु सूर्य से प्राण शक्ति को व पंचभूत प्रकृति को प्राप्त करती है। भारतीय वेद पुराणों ने इस सौर शक्ति के अंदर स्थित कई विधाओं को अलग-अलग देवताओं के रूप में संभावित करते हैं। कई मंत्रों से पता चलता है कि सूर्य वर्ण (रंगों) का कारक है, व शब्द का कारक है। वेदमाता स्पष्ट रूप से बताती है कि एक ही सूरज का प्रकाश सात रंगों में विश्लेषित होकर आता है। ‘अशु व्याप्तौ’ इस धातु से अश्व शब्द की उत्पत्ति हुई है। शीघ्रता से प्रसारित होकर (यात्रा करके) व्याप्त होने वाले लक्षण जिसमें है, उसे अश्व कहते हैं। कांति उस लक्षण से संयुक्त महान शक्ति है। एक ही कांति का सात रंगों के किरणों में परिवर्तित होना ही सप्त अश्व के रूप में वर्णित हुआ है।
            उष्णता, दीप्ति, वर्ष और स्निग्धता- यह सब सूर्य किरणों के अंतर्गत  शक्तियां हैं। इनके कई नाम हैं। स्निग्धता को कल्पित करने वाला लक्षण सूर्य में है। अतः इसको मित्र कहते हैं। वर्षा कारक लक्षण वरुण है। पोषण करने वाला लक्षण पूषा है। प्रकाश लक्षण भग है। यही इनके कई नाम हैं। सात किरणों की कान्तियों में और भी कई सारे वर्णों का उद्भव होता है। यही बात वेद में वर्णित हुआ है- ‘चित्रं देवानाम्’ मन्त्र में। ऐसे बहुत सारे सूर्य ज्योतिर्मंडल में हैं, फिर भी हर सूर्य के अंदर परमेश्वर की ही शक्ति होती है। अतः हमारे सौर परिवार के सूर्य को हम भगवान के रूप में आराधन करते हैं। हम सबको प्राण प्रदान करने वाले सूर्य को प्राणरहित अग्निकुंड के रूप में भावित करना मूर्खता है।
            हर ग्रह को अपनी आकर्षक शक्ति से उसके उचित कक्षा में चलाने वाली कर्षण शक्ति को कृष्ण कहते हैं। (‘आकृष्णेन रजसा वर्तमानो.. यह मंत्र इसका आधार है।) उन प्रकाशों के द्वारा सौर शक्ति हर जगह व्याप्त होती है, अतः व्यापक धर्म के कारण वही विष्णु है। अपने तीव्र प्रकाश से तपाने वाले रुद्र भी वही है। संसार का शुभ करने वाला है, अतः शिव है। आदित्य हृदय सूर्य को सर्व देवतात्मक के रूप में वर्णित करती है। कालकर्ता, ऋतुकर्ता, कर्मसाक्षी शब्दमय- जैसे विशेषणों को परखने पर यह पता चलता है कि प्राचीन ऋषियों ने सूर्य की कितनी अध्ययन की है।
            ब्रहमा विष्णु शिवात्मक के रूप में भावित होने वाला सूर्य ही अन्नदाता है। थोड़ा और सोचने से यह विषय स्पष्ट होती है। ईश्वर शक्ति को विनियोग करने वाले भौतिक विज्ञान पद्धतियों के साथ उस में स्थित दैविक आत्मा को जागृत करके आध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त करने वाले सूक्ष्म ज्ञान संपत्ति को सनातन धर्म प्रबोधन करती है। यह मतधर्म से परे सत्य का दर्शन है। इस देश के प्राचीन संस्कृति है। प्रकाश का आराधन करने वाला यह देश सूर्याग्नि के संकेत के रूप में यज्ञ व उपासना का प्रबोधिन किया है।
            दीप प्रज्वलन जैसी क्रियाएं कांति आराधन के संकेत हैं। देवता का अर्थ है प्रकाश का स्वरूप सूर्य का प्रकाश ही देवता है। सूर्य शब्द का प्रेरक, सृष्टिकर्ता - यह अर्थ भी है। आदित्य का अर्थ है ‘कभी ना छिन्न होने वाला तेजस का स्वरूप’। रवि, अर्क, इंद्र, नारायण, नीललोहित- यह सारे नाम सूर्य के ही हैं। जो अंधेरे का संकेत है- ऐसे अज्ञान और असत्य आदि को राक्षस के रूप में बताकर, उनका छेदन करने वाले आदित्य (देवताओं) का ही कांतिशक्तियों के रूप में वर्णन हुआ है।
            ‘जगत को जगाने वाला सूर्य हमें परख रहा है। यही परमात्मा है’ ऐसा विश्वास करने वाला कोई दोष आचरण नहीं करेगा। सूर्य शक्ति को ऋतुओं के गमन के अनुरूप ग्रहण करने वाली पद्धतियां ही इस देश में विविध पर्वों के रूप में मनाए गए हैं। जिस प्रकार शरीर में आत्मा है, उसी प्रकार जगत में सूर्य है। यह बताते हुए सूर्य आत्मा को जगाता है- ऐसे विश्वात्मा के रूप में आदित्य का अभिवर्णन हुआ है। सूर्योदय से पूर्व ही नींद से उठकर, घर और अपने शरीर को साफ करके, उदय होने वाले सूर्य का स्वागत करने वाली हमारी संस्कृति है। बाल सूर्य को अंजलि देकर अर्घ्य देने वाले संध्या उपासना को यदि थोड़ा परखकर देखें तो कांति की आराधना करने वाले भारत के लोगों के भव्य व्यक्तित्व को हम नमन करेंगे। सूर्य को नारायण के रूप में आराधना करते हुए ‘ध्येयः सदा सवित्र मंडल मध्यवर्ती’ ऐसा कहकर नमस्कार करते हैं। उस सूर्य के अरुण कांतियों में करुणा को दर्शित कर अरुणांबिका ललिता के रूप में उपासना करते हैं।
            अच्छी तरह परखने पर हमारे सारे देवता सूर्य के ही स्वरूप हैं। पुराणों ने यह उद्घोषित किया है कि आदित्य मंडल में अपने इष्ट देव की आराधना करने पर मुक्ति प्राप्त होती है। देवताओं के नाम, रूप, विशेषणों को अच्छी तरह परखने पर इस अपूर्व सौर विज्ञान का आविष्कार होता है।
            युद्ध भूमि में अगस्त्य के द्वारा श्रीराम आदित्य हृदय को प्राप्त करते हैं। महाभारत में धौम्य ऋषि की आज्ञा से धर्मराज सूर्योपासना करके अन्नवर को प्राप्त करते हैं। सूर्य को प्रत्यक्ष दैव के रूप में जानकर भौतिक आध्यात्मिक संकेतों को सूर्य शक्ति में संभावित करनेवाला आर्ष विज्ञान पूरी दुनिया को पाठ पढ़ाती हैं॥

Friday, 4 May 2018

एष धर्मः सनातनः - 9 - यही परंपरा है


(ग्रन्थ- “एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. २३४)

            जब किसी देवता की पूजा, या कोई शुभ कार्य हो तो उस समय देवताओं का, ऋषियों का, महात्माओं का स्मरण करना संप्रदाय है। सबसे पहले विघ्नों के नाश के लिए ‘श्रीगणेशाय नमः’ का स्मरण करके, चार देवता दंपति, व एक ऋषि दंपति को आदर्श दंपति के रूप में स्मरण करते हैं।
   श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः, श्रीलक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः, श्रीवाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः, श्रीशचीपुरंदराभ्यां नमः, श्रीअरुन्धतीवशिष्ठाभ्यां नमः, श्रीसीतारामाभ्यां नमः, सर्वेभ्यो महाजनेभ्यो नमः- यह हमारे द्वारा स्मरण किए जाने वाले मंत्र के समान वाक्य हैं। इस वाक्य परंपरा में अद्भुत आंतर्य है।
            सबसे पहले त्रिमूर्तियों का और उनकी शक्तियों का स्मरण करते हैं। सृष्टि स्थिति और लयकारक इस विश्व का आधार है। सच कहें तो इन तीनों कार्यों के लिए तीन अलग रूप लगने वाले ईश्वर एक ही है। इसी बात को जानने के लिए पहले के तीन वाक्य हैं। महेश्वर के शरीर में, नारायण के ह्रदय में और ब्रह्मा के वाक् में शक्ति स्थित है। इसका तात्पर्य यह है कि, परमेश्वर की त्रिकरण शक्तियाँ मनो वाक् काय कर्म ही पराशक्ति है। एक परमेश्वर, परम पुरुष जब तीन मूर्ति बनते हैं, तब एक पराशक्ति उनकी तीन शक्ति के रूप में व्यक्त होती है।
            इन तीनों मूर्तियों द्वारा आज्ञा व शक्ति पाने वाला इंद्र शचीदेवी के सहकार से तीनों लोकों का पालन करते हैं। अर्थात दांपत्य धर्म मानव कल्पित नहीं है। इससे पता चलता है कि विश्व में निहित प्रकृति पुरुषात्मक शक्ति का संकेत है। दांपत्य को दिव्यत्व की स्थाई प्रदान करने वाली संस्कृति की महानता है यह। दांपत्य द्वारा दैवत्व को पा सकते हैं- ऐसी घोषणा करने वाला विज्ञान है यह।
            स्त्री पुरुष की शक्ति का स्थान है , त्रिकरणों को प्रेरित करने वाला बल है, यह सिद्ध करते हुए हर वाक्य में पुरुष स्वरूप से भी पहले स्त्री के नाम का प्रस्ताव किया। परस्पर सहकार ही दांपत्य लक्षण है। दिव्यत्व की स्थाई में स्थित इस दांपत्य धर्म को विश्व तक पहुंचाने वाला विज्ञानी ही ऋषि है।
            ऋषियों के द्वारा एक दिव्य धर्म ईश्वर के प्रेरणा से संसार में रखा जाता है। वे ऋषि बहुत सारे हैं। सभी का आदि ऋषि वशिष्ठ है। उनकी धर्मपत्नी अरुंधति है। यह ऋषि दंपति है इनके द्वारा दांपत्य धर्म को आचरण पूर्वक उपदेश किया गया है। और मनुष्य को पशु की स्थिति से लेकर उत्तम आदर्श में स्थापित किया है। बस इनके स्मरण करने मात्र से सभी ऋषियों का स्मरण हो जाता है।
            उस दिव्य दांपत्य को व ऋषि धर्म को अच्छी तरह आचरण करके एक और दिव्य तत्व का और दूसरी ओर मानवता का समन्वय करने वाले आदर्श रूप से खड़े परम उन्नत आदर्श दंपति है श्री सीताराम। सूर्य की कांति के समान सीता मुझसे अभिन्ना है- ऐसा श्रीराम ने उद्घोषित किया। इसीलिए उनको सीता समेत स्मरण करते हैं।
            दंपत्ति धर्म को आधारित करके ही कुटुंब या परिवार की व्यवस्था रहती है। उसका सहारा लेकर आगे संवर्धित हुई सामाजिक व्यवस्था ही इस भव्य देश के प्रत्येक धार्मिकता है। यही प्रवृत्ति धर्म है। व्यक्ति धर्म, परिवार धर्म, सामाजिक धर्म, निष्पाप रूप से और शाश्वत क्षेम के लिए अनुसरण करने वाले ही महापुरुष हैं। इसीलिए उनका स्मरण करना चाहिए। प्रवृत्ति धर्म को आश्रित करके रहने वाले (गृहस्थ) मानव सारे इस दांपत्य धर्म परंपरा का नित्य स्मरण करें। एवं उसके द्वारा धर्म स्वरूप को समझें- यही सोचकर हमारे पूर्वजों ने इस अनुष्ठान को नित्य नैमित्तिक कर्मों में प्रवेशित किया॥

Friday, 13 April 2018

एष धर्मः सनातनः - 8. यह विधान परस्पर विरुद्ध नहीं है

(ग्रन्थ- “एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. ३१२)

            वेदों को आधारित करके वर्धित होने वाले हमारे सनातन धर्म में मानव कल्याण के लिए अनेक साधनाओं का आविष्कार हुआ है। देवता के आराधना, नियमबद्ध स्वास्थ्यकारी जीवन विधान, मानव संबंधों के दायित्व, प्रवर्तन व्यवहार सरणी, योग विद्या, वेदांत विचार- इस प्रकार बहुमुखी जीवन के सार्थक मार्ग बनाए गए। यह अपने आप में अलग अलग दिखने पर भी इनके बीच में एक सुदृढ़ अनुबंध समन्वयक है । इस समन्वयक अनुबंध को नहीं देख कर, इन्हें अलग अलग से देखने वाला वैचारिक विधान संपूर्णता को साधने नहीं देता।
            कुछ लोग कहते हैं- ‘ध्यान करें तो पर्याप्त है, यह पूजा पुनस्कार यह सब वहम है’।  इससे दैव पूजा मार्ग में जो भी हैं, उनको बहुत भ्रम हो जाता है। फिर, ध्यान में भी तो कितने सारे प्रकार हैं। साकार निराकार यह सब पुनः झगड़े होते हैं। ‘इन सबसे बढ़िया मंत्र जप है’- ऐसा दूसरा विधान है। ‘इन सब से परम श्रेष्ठ योगाभ्यास है’ ऐसा कुछ अन्य लोग कहते हैं। तो फिर कौन से मार्ग का अनुसरण किया जाए?
            हमारे संप्रदाय साहित्य को व पुराण वाङ्मय को देखें तो सत्य स्पष्ट होता है कि यह सब एक दूसरे के सहायता ही हैं। ऐसा कहीं पर नहीं बताया गया है कि केवल एक ही विधि सत्य है। मानव के बौद्धिक स्थाई में बहुत सारे विघ्न बाधाएं होती हैं। उन सबको देखते हुए ऊपर के मार्गों में से किसी एक में कुछ लोगों को पकड़ बनती है कुछ और लोगों को किसी और में अनुकूलता साध्य होती है।
            हमें दिव्यत्व की स्थिति तक संवर्धित करने के लिए ही इतने सारे मार्ग बनाए गए हैं। यह सब मिलकर हिंदू मतधर्म के रूप में भारतीय संस्कृति के रूप में परिगणित होते हैं। ‘वेदांत विचारण करें, तो बहुत है, यह पूजा पाठ की कोई आवश्यकता नहीं’- ऐसा आजकल उपनिषद के अनुवाद ग्रंथों को पठन करना प्रारंभिक करने वाला एक वृद्ध ने, जो नया वेदांत विद्यार्थी था, प्रश्न किया। ‘वेदांत विचारणा करें तो बहुत है भोजन वस्त्र की क्या आवश्यकता है?’ यह प्रश्न जिस प्रकार का है ऊपर वाला प्रश्न भी वैसा ही है। जिस प्रकार तत्त्वज्ञान का भोजन करने का संबंध नहीं होता, उसी प्रकार वेदांत मार्ग का पूजा का विरोध नहीं है। जिसका प्रयोजन जो है, वह है। जितने समय तक शरीर का स्मरण व शरीर की भावना रहे, इतने समय तक जितना हो सके उतनी देवता आराधना, पितरों की सत्कृति, सत्कार्याचरण बहुत आवश्यक है। गीत आचार्य श्री कृष्ण भगवान ने चेतावनी दी कि, कितना भी बड़ा वेदांती क्यों ना हो यज्ञ, दान, तपस्या आदि नहीं छोड़ना चाहिए, यही कर्तव्य है’।
            पतंजलि जैसे महापुरुषों ने सूचना दी है कि, ‘योग विद्या में पहले दो अंग यम और नियम होते हैं। उनके अंग सत्य, अहिंसा, सदाचार, ईश्वर आराधन- इत्यादि जब सम्पन्न होते हैं, उसके बाद ही योग में आगे बढ़ सकते हैं’। हमारे शरीर के अंदर उन योग केंद्रों के अधिदेवता के रूप में रहने वालों की अनुकूलता को जब तक नहीं पाएंगे तब तक पुरोगति साध्य नहीं होगा। अतः योग साधना में भी देवता आराधना मुख्य है। हर देवता पूजा के लिए प्राणायाम, और ध्यान बहुत आवश्यक होते हैं।
            ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ इत्यादि महावाक्यों के मर्म को विस्तृत रूप से बताने वाले ब्रह्मज्ञानी आदिशंकराचार्य ने भी देवता आराधना की प्रामुख्य को स्पष्ट किया है। सामान्यजन अभीष्ट सिद्धि के लिए, ज्ञान मार्ग में जाने वाले चित्तशुद्धि के लिए, और ज्ञानी कृतज्ञता के लिए- भगवद आराधन करते हैं।  संप्रदाय से सिद्ध किसी मार्ग में जाने वाले अन्य संस्थाओं का व्यतिरेक नहीं करते। अपने मार्ग को बलवत रूप से दूसरों से जोड़कर जितना रख सके उतना रखें।
            हमारे पर्व के विषय पर आयें, तो ‘यह क्या आध्यात्मिक है, या सामाजिक है?’ ऐसी एक चर्चा कुछ लोग करते रहते हैं। यह जो दैवीय विशिष्ट चैतन्य से मिलकर काल विशेष है। वह सामाजिक रूप से, संस्कृति के रूप से, देवी भक्तिपरक से भी प्रमुख हैं। अध्यात्म विद्या कहाजानेवाला वेदांत इसके साथ यदि अन्वित नहीं भी होता तो कोई बड़ी आपत्ति नहीं है।
            वसंतोत्सव (होली), संक्रमण, युगादि, श्रावण उत्सव, गणेश चतुर्थी, दशहरा, दीपावली, कार्तिक मास के व्रत, धनुर्मास के उत्सव-- यह सब पर्व दिनों में प्रकृति के हिसाब से काल में आने वाली बहुत सुंदर मोड़ों का आनन्द लेना ही देखा जाता है। समष्टि जीवन सौभाग्य में प्रेम माधुरी की भावना छिड़कने लगती है। उसे आधारित करके अनेक कलाएँ संवर्धित हुई हैं। यह सब सामाजिक प्रयोजन है।
            अब दैवीय प्रयोजन देखते हैं। वे प्रयोजन हैं-- उन पुण्यकाल के समयों में भगवत्कृपा को संपादित करना, उसके द्वारा पवित्र जीवन का सत्य एवं चित्त की शुद्धि का लाभ उठाना। इसीलिए कुछ लोग पर्वों को आनंद से आचरण करने से मनाते हैं, एवं कुछ लोग जप, तप, यज्ञ, आदि साधन का अनुष्ठान करते हैं। उसी का फल स्वरूप दिव्य ज्ञान को प्राप्त करते हैं। गृहस्थ लोग देव, पितृ, अतिथि पूजन करते हैं। वह ध्यान या योग की स्थिति में जितने भी आगे हो, यह सब व्यक्तिगत साधनाएं होती हैं। पर गृहस्थ के रूप में उनका दायित्व नहीं हुआ करते। यह देवयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य (अतिथि) यज्ञ के कारण ही हो पाते हैं। योग या ध्यान मार्ग में होने के कारण मात्र से घर में दिया तक जलाना भी छोड़ देना ठीक बात नहीं होती है। जब घर है, तो घर के देवताओं को निवेदन आदि करने का दायित्व हुआ ही करता है।
            अंत में यह निष्कर्ष निकलता है कि, परंपरा में आने वाले सारे संप्रदायों का हम आदर पूर्वक देखें। जितना हो सके उतना उनका अनुसरण करें। इसी समरस भावना के कारण संस्कृति को पूरी तरह परिरक्षण कर पाएंगे॥