Friday, 13 April 2018

एष धर्मः सनातनः - 8. यह विधान परस्पर विरुद्ध नहीं है

(ग्रन्थ- “एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. ३१२)

            वेदों को आधारित करके वर्धित होने वाले हमारे सनातन धर्म में मानव कल्याण के लिए अनेक साधनाओं का आविष्कार हुआ है। देवता के आराधना, नियमबद्ध स्वास्थ्यकारी जीवन विधान, मानव संबंधों के दायित्व, प्रवर्तन व्यवहार सरणी, योग विद्या, वेदांत विचार- इस प्रकार बहुमुखी जीवन के सार्थक मार्ग बनाए गए। यह अपने आप में अलग अलग दिखने पर भी इनके बीच में एक सुदृढ़ अनुबंध समन्वयक है । इस समन्वयक अनुबंध को नहीं देख कर, इन्हें अलग अलग से देखने वाला वैचारिक विधान संपूर्णता को साधने नहीं देता।
            कुछ लोग कहते हैं- ‘ध्यान करें तो पर्याप्त है, यह पूजा पुनस्कार यह सब वहम है’।  इससे दैव पूजा मार्ग में जो भी हैं, उनको बहुत भ्रम हो जाता है। फिर, ध्यान में भी तो कितने सारे प्रकार हैं। साकार निराकार यह सब पुनः झगड़े होते हैं। ‘इन सबसे बढ़िया मंत्र जप है’- ऐसा दूसरा विधान है। ‘इन सब से परम श्रेष्ठ योगाभ्यास है’ ऐसा कुछ अन्य लोग कहते हैं। तो फिर कौन से मार्ग का अनुसरण किया जाए?
            हमारे संप्रदाय साहित्य को व पुराण वाङ्मय को देखें तो सत्य स्पष्ट होता है कि यह सब एक दूसरे के सहायता ही हैं। ऐसा कहीं पर नहीं बताया गया है कि केवल एक ही विधि सत्य है। मानव के बौद्धिक स्थाई में बहुत सारे विघ्न बाधाएं होती हैं। उन सबको देखते हुए ऊपर के मार्गों में से किसी एक में कुछ लोगों को पकड़ बनती है कुछ और लोगों को किसी और में अनुकूलता साध्य होती है।
            हमें दिव्यत्व की स्थिति तक संवर्धित करने के लिए ही इतने सारे मार्ग बनाए गए हैं। यह सब मिलकर हिंदू मतधर्म के रूप में भारतीय संस्कृति के रूप में परिगणित होते हैं। ‘वेदांत विचारण करें, तो बहुत है, यह पूजा पाठ की कोई आवश्यकता नहीं’- ऐसा आजकल उपनिषद के अनुवाद ग्रंथों को पठन करना प्रारंभिक करने वाला एक वृद्ध ने, जो नया वेदांत विद्यार्थी था, प्रश्न किया। ‘वेदांत विचारणा करें तो बहुत है भोजन वस्त्र की क्या आवश्यकता है?’ यह प्रश्न जिस प्रकार का है ऊपर वाला प्रश्न भी वैसा ही है। जिस प्रकार तत्त्वज्ञान का भोजन करने का संबंध नहीं होता, उसी प्रकार वेदांत मार्ग का पूजा का विरोध नहीं है। जिसका प्रयोजन जो है, वह है। जितने समय तक शरीर का स्मरण व शरीर की भावना रहे, इतने समय तक जितना हो सके उतनी देवता आराधना, पितरों की सत्कृति, सत्कार्याचरण बहुत आवश्यक है। गीत आचार्य श्री कृष्ण भगवान ने चेतावनी दी कि, कितना भी बड़ा वेदांती क्यों ना हो यज्ञ, दान, तपस्या आदि नहीं छोड़ना चाहिए, यही कर्तव्य है’।
            पतंजलि जैसे महापुरुषों ने सूचना दी है कि, ‘योग विद्या में पहले दो अंग यम और नियम होते हैं। उनके अंग सत्य, अहिंसा, सदाचार, ईश्वर आराधन- इत्यादि जब सम्पन्न होते हैं, उसके बाद ही योग में आगे बढ़ सकते हैं’। हमारे शरीर के अंदर उन योग केंद्रों के अधिदेवता के रूप में रहने वालों की अनुकूलता को जब तक नहीं पाएंगे तब तक पुरोगति साध्य नहीं होगा। अतः योग साधना में भी देवता आराधना मुख्य है। हर देवता पूजा के लिए प्राणायाम, और ध्यान बहुत आवश्यक होते हैं।
            ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ इत्यादि महावाक्यों के मर्म को विस्तृत रूप से बताने वाले ब्रह्मज्ञानी आदिशंकराचार्य ने भी देवता आराधना की प्रामुख्य को स्पष्ट किया है। सामान्यजन अभीष्ट सिद्धि के लिए, ज्ञान मार्ग में जाने वाले चित्तशुद्धि के लिए, और ज्ञानी कृतज्ञता के लिए- भगवद आराधन करते हैं।  संप्रदाय से सिद्ध किसी मार्ग में जाने वाले अन्य संस्थाओं का व्यतिरेक नहीं करते। अपने मार्ग को बलवत रूप से दूसरों से जोड़कर जितना रख सके उतना रखें।
            हमारे पर्व के विषय पर आयें, तो ‘यह क्या आध्यात्मिक है, या सामाजिक है?’ ऐसी एक चर्चा कुछ लोग करते रहते हैं। यह जो दैवीय विशिष्ट चैतन्य से मिलकर काल विशेष है। वह सामाजिक रूप से, संस्कृति के रूप से, देवी भक्तिपरक से भी प्रमुख हैं। अध्यात्म विद्या कहाजानेवाला वेदांत इसके साथ यदि अन्वित नहीं भी होता तो कोई बड़ी आपत्ति नहीं है।
            वसंतोत्सव (होली), संक्रमण, युगादि, श्रावण उत्सव, गणेश चतुर्थी, दशहरा, दीपावली, कार्तिक मास के व्रत, धनुर्मास के उत्सव-- यह सब पर्व दिनों में प्रकृति के हिसाब से काल में आने वाली बहुत सुंदर मोड़ों का आनन्द लेना ही देखा जाता है। समष्टि जीवन सौभाग्य में प्रेम माधुरी की भावना छिड़कने लगती है। उसे आधारित करके अनेक कलाएँ संवर्धित हुई हैं। यह सब सामाजिक प्रयोजन है।
            अब दैवीय प्रयोजन देखते हैं। वे प्रयोजन हैं-- उन पुण्यकाल के समयों में भगवत्कृपा को संपादित करना, उसके द्वारा पवित्र जीवन का सत्य एवं चित्त की शुद्धि का लाभ उठाना। इसीलिए कुछ लोग पर्वों को आनंद से आचरण करने से मनाते हैं, एवं कुछ लोग जप, तप, यज्ञ, आदि साधन का अनुष्ठान करते हैं। उसी का फल स्वरूप दिव्य ज्ञान को प्राप्त करते हैं। गृहस्थ लोग देव, पितृ, अतिथि पूजन करते हैं। वह ध्यान या योग की स्थिति में जितने भी आगे हो, यह सब व्यक्तिगत साधनाएं होती हैं। पर गृहस्थ के रूप में उनका दायित्व नहीं हुआ करते। यह देवयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य (अतिथि) यज्ञ के कारण ही हो पाते हैं। योग या ध्यान मार्ग में होने के कारण मात्र से घर में दिया तक जलाना भी छोड़ देना ठीक बात नहीं होती है। जब घर है, तो घर के देवताओं को निवेदन आदि करने का दायित्व हुआ ही करता है।
            अंत में यह निष्कर्ष निकलता है कि, परंपरा में आने वाले सारे संप्रदायों का हम आदर पूर्वक देखें। जितना हो सके उतना उनका अनुसरण करें। इसी समरस भावना के कारण संस्कृति को पूरी तरह परिरक्षण कर पाएंगे॥

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