(ग्रन्थ- “एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. २३४)
जब
किसी देवता की पूजा, या कोई शुभ कार्य हो तो उस समय देवताओं का, ऋषियों का,
महात्माओं का स्मरण करना संप्रदाय है। सबसे पहले विघ्नों के नाश के लिए ‘श्रीगणेशाय
नमः’ का स्मरण करके, चार देवता दंपति, व एक ऋषि दंपति को आदर्श दंपति के रूप में
स्मरण करते हैं।
श्रीउमामहेश्वराभ्यां
नमः, श्रीलक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः, श्रीवाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः, श्रीशचीपुरंदराभ्यां
नमः, श्रीअरुन्धतीवशिष्ठाभ्यां नमः, श्रीसीतारामाभ्यां नमः, सर्वेभ्यो महाजनेभ्यो
नमः- यह हमारे द्वारा स्मरण किए जाने वाले मंत्र के समान वाक्य हैं। इस वाक्य
परंपरा में अद्भुत आंतर्य है।
सबसे
पहले त्रिमूर्तियों का और उनकी शक्तियों का स्मरण करते हैं। सृष्टि स्थिति और
लयकारक इस विश्व का आधार है। सच कहें तो इन तीनों कार्यों के लिए तीन अलग रूप लगने
वाले ईश्वर एक ही है। इसी बात को जानने के लिए पहले के तीन वाक्य हैं। महेश्वर के
शरीर में, नारायण के ह्रदय में और ब्रह्मा के वाक् में शक्ति स्थित है। इसका
तात्पर्य यह है कि, परमेश्वर की त्रिकरण शक्तियाँ मनो वाक् काय कर्म ही पराशक्ति
है। एक परमेश्वर, परम पुरुष जब तीन मूर्ति बनते हैं, तब एक पराशक्ति उनकी तीन
शक्ति के रूप में व्यक्त होती है।
इन
तीनों मूर्तियों द्वारा आज्ञा व शक्ति पाने वाला इंद्र शचीदेवी के सहकार से तीनों
लोकों का पालन करते हैं। अर्थात दांपत्य धर्म मानव कल्पित नहीं है। इससे पता चलता
है कि विश्व में निहित प्रकृति पुरुषात्मक शक्ति का संकेत है। दांपत्य को दिव्यत्व
की स्थाई प्रदान करने वाली संस्कृति की महानता है यह। दांपत्य द्वारा दैवत्व को पा
सकते हैं- ऐसी घोषणा करने वाला विज्ञान है यह।
स्त्री
पुरुष की शक्ति का स्थान है , त्रिकरणों को प्रेरित करने वाला बल है, यह सिद्ध
करते हुए हर वाक्य में पुरुष स्वरूप से भी पहले स्त्री के नाम का प्रस्ताव किया।
परस्पर सहकार ही दांपत्य लक्षण है। दिव्यत्व की स्थाई में स्थित इस दांपत्य धर्म
को विश्व तक पहुंचाने वाला विज्ञानी ही ऋषि है।
ऋषियों
के द्वारा एक दिव्य धर्म ईश्वर के प्रेरणा से संसार में रखा जाता है। वे ऋषि बहुत
सारे हैं। सभी का आदि ऋषि वशिष्ठ है। उनकी धर्मपत्नी अरुंधति है। यह ऋषि दंपति है
इनके द्वारा दांपत्य धर्म को आचरण पूर्वक उपदेश किया गया है। और मनुष्य को पशु की
स्थिति से लेकर उत्तम आदर्श में स्थापित किया है। बस इनके स्मरण करने मात्र से सभी
ऋषियों का स्मरण हो जाता है।
उस
दिव्य दांपत्य को व ऋषि धर्म को अच्छी तरह आचरण करके एक और दिव्य तत्व का और दूसरी
ओर मानवता का समन्वय करने वाले आदर्श रूप से खड़े परम उन्नत आदर्श दंपति है श्री सीताराम।
सूर्य की कांति के समान सीता मुझसे अभिन्ना है- ऐसा श्रीराम ने उद्घोषित किया।
इसीलिए उनको सीता समेत स्मरण करते हैं।
दंपत्ति
धर्म को आधारित करके ही कुटुंब या परिवार की व्यवस्था रहती है। उसका सहारा लेकर
आगे संवर्धित हुई सामाजिक व्यवस्था ही इस भव्य देश के प्रत्येक धार्मिकता है। यही
प्रवृत्ति धर्म है। व्यक्ति धर्म, परिवार धर्म, सामाजिक धर्म, निष्पाप रूप से और
शाश्वत क्षेम के लिए अनुसरण करने वाले ही महापुरुष हैं। इसीलिए उनका स्मरण करना
चाहिए। प्रवृत्ति धर्म को आश्रित करके रहने वाले (गृहस्थ) मानव सारे इस दांपत्य
धर्म परंपरा का नित्य स्मरण करें। एवं उसके द्वारा धर्म स्वरूप को समझें- यही
सोचकर हमारे पूर्वजों ने इस अनुष्ठान को नित्य नैमित्तिक कर्मों में प्रवेशित किया॥
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