(ग्रन्थ- “एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. ९३-९५)
किसी व्यक्ति को भगवान से क्या माँगना चाहिए? बहुत
सारा हो सकता है। पर हमारे जीवन में हमें जो कुछ चाहिए, उनमें से सबसे मुख्य
वस्तुओं को, बहुत दिशाओं में विश्लेषित करके, प्राचीन ऋषियों ने अद्भुत रूप से
आविष्कृत किया है। ऐसे मंत्रमय आकांक्षाओं से भगवान की प्रार्थना करना अवश्य अच्छे
फल दे सकता है- ऐसा उपासकों का स्वानुभव है।
हमारे महर्षियों ने
परमेश्वर की आराधना करते सिर्फ़ तीन कामनाओं को व्यक्त किया है। हर व्यक्ति
प्रतिदिन इन तीनों की कामना करे, तो पर्याप्त है।
इन तीनों को बताने से
पहले एक छोटे से संदेह को निवारित करना चाहिए। क्या हमें भगवान को कामना पूर्वक या
सकाम पूजा करना चाहिए या नहीं। यह बहुत सारे लोगों का संदेह है। जब कामना है तो उस
कामना को भगवान से विनती करने में कोई दोष नहीं है। व्यक्ति को ‘इष्ट की प्राप्ति’
(यानी मांगी हुई वस्तु का मिलना) और अनिष्ट परिहार (यानी अनिश्चित वस्तु के
निकालने के लिए) देवताओं से प्रार्थना करना पूजा करना चाहिए, ऐसा प्राचीन
शास्त्रों का निर्देश है। निष्काम उपासना श्रेष्ठ है, पर सकाम आराधन दोष नहीं है।
उस पर भी, जो धर्म विरुद्ध नहीं है, ऐसे कामनाओं को मांगना ठीक ही है।
ईश्वर आराधना में प्रभु
से प्रार्थना करके मांगने वाली वस्तुओं को एक श्लोक में निबद्ध करके महात्माओं ने
बताया।
अनायासेन
मरणं, विना दैन्येन जीवितम्।
देहान्ते
तव सायुज्यं देहि मे पार्वतीपते॥
हे पार्वती पते, बिना प्रयास
के मृत्यु, बिना दयनीयता का जीवन, और देह को छोड़ने के बाद मुक्ति- इन तीनों को
मुझे प्रसादित करें - ऐसा श्लोक का भाव है।
पहले ‘अंत सुख से हो’
ऐसा मांगना सबसे समुचित बात है। प्राण प्रयाण के समय जो शारीरिक व मानसिक यातना
होती है, वह हमारे अधीन नहीं है। अतः उस समय कोई भी यातना ना हो, फिर अकाल मृत्यु
दुर्मरण- इस प्रकार की यातनाएँ ना हो और भगवान के स्मरण पूर्वक देह को छोड़ना एक
वर है।
दूसरी बात जिंदगी को
बिताने का विधान। यह दयनीय स्थिति के बिना हो; चिंता, व्याधियां के बिना हो। मन को
निराश करने वाले विपत्तियों में ना पड़कर जीवन साफ-साफ आगे बढ़े। ऐसा सब की कामना
होती है- यही बात इस में बताई गई है।
तीसरा और अंतिम लक्ष्य
है- जीवन के अंतिम लक्ष्य यह है वह मृत्यु नहीं है। मृत्यु के बाद जीव की स्थिति
क्या है? जिन दुष्कर्मों का आचरण किया, उनके हिसाब से दुर्गति होती है। उससे कोई
बच नहीं सकता। अतः पुनः दुर्गति के भागी ना बनें, जन्म परंपराओं में ना पड़े,
परमेश्वर में लय हो जाए- ऐसा हमें माँगना चाहिए। इस लक्ष्य के सिद्धि के लिए सारा
जीवन सद्बुद्धि, सत्कर्मों व सद्भक्ति के साथ बिताना चाहिए- ऐसा ही जीवन दयनीय
रहित जीवन होता है।
सदैव भक्ति के साथ
सदाशिव को जो भजते हैं, स्मरण व आराधना करते हैं, उनको इन तीन कामनाओं का पूरा
होने में कोई संदेह नहीं है। शिव मृत्युंजय है अमृतेश्वर है।
पूरी जगत के लयकारक वही
है। उन्हीं के कारण सृष्टि और स्थिति चलते हैं। लय यानी लीन अवस्था। सृष्टि पूरी
उन्हीं में लीन हो जाती है होकर चलती रहती है। तरंगें समुद्र में जन्म लेते है,
वहीं पर बढ़ते हैं, फिर उसी में लीन हो जाते हैं। इसी प्रकार चराचर जगत में उन्हीं
में जगत है, बढ़ती है और लीन हो जाती है उसी का जो आधार स्वरूप चैतन्य है वही शिव
है वह काल काल है महाकाल भी है सृष्टि में सब काल के अधीन है परिणाम ना सब काल के
हिसाब से ही चलते हैं सृष्टि हो स्थिति हो या फिर नाश हो सब काल के ही अधीन है और
यह काल परमेश्वर के अधीन है।
सर्वं वशीकृतं
यस्मात् तस्मात् शिव इति स्मृतः ॥
सब जिसके वश में है,
वही शिव है। ‘शिव की आज्ञा के बिना चींटी भी नहीं काटती है’ ऐसा एक कहावत है।
लयकारक के अधीन में सृष्टि स्थिति है। अंततः जन्म मरण रूप संसार चक्र का परमात्मा
में लीन होने के लिए भी उन्हीं की कृपा आवश्यक है। वह लीन होना (लय) भी उन्ही का
स्वरूप है। मुमुक्षु जन उस शाश्वत लय की ही कामना करते हैं। इसीलिए शिव को मुक्ति
प्रदाता के रूप में भजते हैं।
दुःख का अंत करनेवाला वही
परमेश्वर रोग आधी दुःख का भी नाशक है, अतः वह ‘रुद्र’ के नाम से स्तुति किए जाते
है। (रुजां द्रावयतीति रुद्रः- ऐसा वेद निरुक्त कहता है।)
सारा विश्व काल में
निबद्ध होकर एक लय से आगे बढ़ता है। यह लय हर पल हर कण में होता रहता है। इस लय के
अनुरूप चैतन्य ही विश्व गमन है। यह लय का स्वरूप ही शिव का नाट्य है। अतः उनको
नटराज कहते हैं। इतने लय का निर्वाह करनेवाला वह स्वयं तो किसी में लीन नहीं होता।
वह शाश्वत है।
विश्व को डरानेवाले विष
को पीकर कंठ में बंधित करने वाले करुणा मूर्ति हैं। ऐसे मृत्यु के अतीत जो नित्य
तत्व है वह स्वयं वही है, ऐसा उन्होंने निरूपित किया। सारे देवता अमृत को पीकर
थोड़ा सा अपने आयु को बढ़ाएँ हैं, पर शिव स्वयं अमृत के स्वरूप है, इसीलिए देवताओं
के भी देव हुए। इद्रादि देवता भी अशाश्वत हैं। पर यह महादेव स्थिर स्थाणु अचल अमृत
और शाश्वत है। अतः विष को भी पीकर अपने स्वाभाविक अमृत तत्व को प्रत्यक्ष किया।
अमृत कला के संकेत में
चंद्रलेखा को धरकर चंद्रशेखर बन गये। मृत्यु से भयभीत (डरे हुए) मार्कण्डेय को बचा
कर अपने काल पर अधिकार को आविष्कृत किया।
विश्व का शासन करने
वाला, जगत के ऐश्वर्य के नियामक है- इसीलिए वह महेश्वर, विश्वेश्वर, सर्वेश्वर,
परमेश्वर है। ब्रहमा, विष्णु इत्यादि स्वरूप उन्हीं के व्यक्तीकरण हैं।
महाशिवरात्रि संदर्भ में उस सदाशिव को संस्मरण करते हुए, ऐसा नमन करेंगे कि वह समस्त
जगत को सुख शांति प्रसाद करें॥
No comments:
Post a Comment