Sunday, 8 April 2018

एष धर्मः सनातनः - 3. परिक्रमा (अनूदित लेख)


(ग्रन्थ- एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. ३२-३४)

            भगवान के उपचारों में परिक्रमा नमस्कार अंतिम होता है। इतना ही नहीं, परिपूर्ण भी है। किसी ग्रहचार के ठीक ना चलने पर, अरिष्टों के होने पर देवालयों में नियमित संख्या में परिक्रमा करने से उनका परिहार हो जाता है- ऐसा शास्त्र वचन है। और बहुत सारे लोगों का अनुभव से भी सिद्ध है।
            देवालय में परिक्रमा करने के बहुत सारे प्रकार हैं। सामान्यतः ध्वज स्तंभ से प्रारंभ करके पुनः अंतिम बलि पीठ (ध्वजस्तंभ) के पास पहुंचकर भगवान का नमस्कार करना परिक्रमा का क्रम है। चंडीश्वर शिवालय में परिक्रमा विधान अन्य रीति से होती है। इसका चंडी परिक्रमा नाम होता है। घर में पूजा के संदर्भ में आत्म प्रदक्षिणा या आत्म परिक्रमा करते हैं। मंदिरों में आत्म परिक्रमा नहीं करनी चाहिए।
            परिक्रमा में बहुत सारे रहस्य हैं। देवालय में जो देवता है वह विश्व शक्ति केंद्र बिंदु के प्रतीक होता है। उनके सारे ओर जो देवालय है, वह अनंत विश्व का संकेत है। दुनिया में परिणाम ही परिक्रमा है।
            जीवन ही एक परिक्रमा या आवृत होता है। जन्म से लेकर मरण तक इस विश्व में सारा जीवन ही एक परिक्रमा है। इस प्रकार कितने परिक्रमा में या जन्म परंपरा में हमने कर्मफल को प्राप्त किया है, वह इस जन्म में अनुभव करते हैं। लेकिन परिक्रमा के नाम पर परमात्मा के इर्द-गिर्द घूमने से जन्म मरण के आवृत्तों में जो कर्मों के दुष्परिणाम है, उनको हम निकाल सकते हैं। इतना ही नहीं, अत्यधिक परिक्रमा करने से आने वाले जन्मों के आवृतों को भी हम परे जा सकते हैं। विश्व में आज जितने परिक्रमा किए उतने पुनः नहीं कर सकते। अतः विश्वेश्वर के परिक्रमा करने पड़ते हैं।
                        जननं मरणं द्वंद्वं मायाचक्रमितीरितम् । (शिव पुराण)
                        क्रियया जपरूपं हि प्रणवं तु प्रदक्षिणम् ।
            कर्म क्षय ही प्रदक्षिणा में परमार्थ है।
            प्रदक्षिण-क्रियारूप-प्रणव-जपम्ऐसा शिव पुराण में वर्णित हुआ है। साधारणतः परिक्रमा करते हुए जो हम श्लोक पढ़ते हैं, वह इस प्रकार है-
                        यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
                        तानि तानि प्रणश्यंति प्रदक्षिणे पदे पदे॥
            विविध जन्मों में किए हुए पापों को प्रदक्षिणा के एक-एक पद से निकालते हैं- ऐसा ऊपर वाले श्लोक का आंतर्य है। ‌
            दुखों का मूल जो पाप है, उनके निवारण से जीव शुद्ध होकर दुख को अतिक्रमण करता है। सूर्य से उद्भव हुए ग्रह समूह सूर्य शक्ति के ही कारण विविध गतियों में संचालित होता है। इसी प्रकार विश्व में हर अणु परमात्मा का केंद्र होकर उनके दिए हुए शक्ति से ही चलता रहता है। सच तो यह है कि भूमि आत्म प्रदक्षिणा करते सूर्य देव की परिक्रमा करती है।
            हमारे मन वाक् (वचन) और कर्म से परमात्मा के आगे पीछे घूमते रहें- यही प्रदक्षिणा का प्रधान उद्देश्य है।
            एक बार कैलास में एक घटना घटी। पूरे विश्व में घूमकर जो शीघ्र वापस आए उनको गण आधिपत्य दिया जाएगा- ऐसा एक शर्त विधान किया गया। तब कुमार स्वामी ने मयूर वाहन चढ़कर विश्व की परिक्रमा करने के लिए चल पड़े। मूषक वाहन महागणपति ऐसा नहीं कर पाए। पर उन्होंने विवेक से अपने माता पिता पार्वती परमेश्वर के परिक्रमा कर लिए। विचित्र बात है कि जहां-जहां सुब्रमण्य पहुंचे, वहां वहां उनसे पहले ही गणपति के आकर जाने के संकेत दिखे। विश्व की परिक्रमा पहले कर के आए हुए गणेश को ही मानकर शिवजी और अन्य देवताओं ने उन्हीं को गणाधिपति बनाया। कुमारस्वामी के रूठने पर शिव पार्वती ने उन्हें मनाया।
            इस कथा से यह पता चलता है कि परमेश्वर के आसपास घूमना दुनिया को पूरा प्रदक्षिणा करके आनेके समान है। विश्व व्यापक विश्व प्रभु को परिश्रम करके आना दुनिया में परिक्रमा करने के स्थिति को पार करना ही होता है। ऊपर की कथा से कुमार और गणपति में ऊंच नीच को नहीं ढूंढना चाहिए। जहाँ स्थित हैं वही ईश्वर को आविष्कृत करें- ऐसा गणपति का संदेश है। सब जगह ईश्वर को दर्शन करें- यह सुब्रमण्य को प्रबोध हुआ है। जो केंद्र में है, वही सारी ओर विस्तृत है। पूरा विश्व का वृत्त केंद्र मूल शक्ति परमेश्वर का ही विस्तार है॥

No comments:

Post a Comment