Sunday, 8 April 2018

एष धर्मः सनातनः - 4. स्वस्ति (अनूदित लेख)


(ग्रन्थ- एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. २८७)

शुभ की कामना करना वैदिक संस्कृति का प्रधान अंग है। प्रकृति शक्तियां, उन शक्तियों को अधिष्ठित होकर निर्वाहन करने वाले देवता, काल रूप में स्थित भगवान, हित करने की क्षमता- वेद मंत्रों में शक्तियुक्त होकर दृष्टिगोचर होती है। यज्ञ यागादि, क्रतु के निर्वहण, ध्यानयोग आदि दीक्षा, पूजा, स्तोत्र आदि आराधना में शुभ संकल्पों के साथ यह पुष्ट हुए हैं।
            यज्ञादि का फल स्वस्ति है। यज्ञ का स्वरूप ही स्वस्ति है। वैदिक यज्ञ तत्त्व भारतीय सनातन धर्म में व्याप्त है।
                        स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः, स्वस्ति नः पूषा...
            इंद्र सूर्यादि देवता स्वस्ति देते हैं- ऐसा श्रुति बताते हैं। हम सब अच्छी स्थिति में रहे- यही उस दिव्य शब्द का अंतरार्थ है। सु+अस्ति = स्वस्ति। अस्ति शब्द रहनेको सूचित करता है। सुका अर्थ अच्छाहोता है। अच्छे से रहना ही स्वस्ति है। इस भव्य भाव का स्वरूप ही स्वस्ति देवता है। यज्ञ के फल के रूप में अच्छी स्थिति को पाते हैं। अतः यज्ञ के अंत में स्वस्ति करना अनूचान पद्धति है।
            हमारे परिसरों को पवित्र करके, हमारे देश काल परिस्थिति- यह तीन शुभ स्थिति में रहे- इस कामना से स्वस्ति पुण्याहवाचन करना भी हमारे संप्रदाय का प्रधान भाग है। हम हमेशा अच्छे मार्ग का ही अनुसरण करें- ऐसा वेद मंत्र की भावना है। हमें जगत की हितकारी शुभ मार्ग में ही जाना चाहिए- यह स्वस्ति पंथा है।
                        स्वस्ति पंथामनुचरेम-
            अच्छे मार्ग का ही अनुसरणत करेंगे- ऐसा ऋग्वेद का मंत्र है। सूर्य व चंद्र के जैसे’- ऐसी सुंदर बात को वेदमाता कहती है। सूर्य और चंद्र निस्वार्थ भाव से अपने धर्म को निभाते हुए जगत का मंगल करते हैं। उन्हीं के जैसे मानव जाति सर्व शुभ भावना को भावित करें, बात करें और व्यवहार करें। जो भी पुण्य कार्य करें, अंत में स्वस्ति कहना हमारा विधान है। इसका अर्थ है- सब मंगल हो ऐसी आकांक्षा करना। सृष्टि में स्वस्ति करने वाले दाता, अहिंसा, और ज्ञानीहोते हैं- ऐसा ऋग्वेद में बताया गया है।
            दया स्वभाव से दान गुण का जन्म होता है। जो अपने पास है, उसे सत्पात्र व्यक्ति को देना एक सद्गुण है। इस वितरण करने वाले गुण को भी सूर्यादि से ग्रहण करना चाहिए। कांति को दान करने वाले सूर्य, बल को दान करने वाले पर्जन्य, रस शक्ति देने वाला चंद्र, आधार देने वाली वसुंधरा- यह सब परमात्मा के स्वस्ति के ही स्वरूप है, जो प्रकृति रूप में फैली हुई है। यह सब दाता का स्वभाव वाले हैं। यह दान लक्षण ही भगवान का करुणा तत्त्व है।
            अतः यह गुण जिनमें हैं, वे देवता लक्षण युक्त उत्तम लोग हैं। इस प्रकार का दान गुण रखने वाले ही इस भूमि की स्वस्ति है। इसी प्रकार हिंसात्मक स्वभाव से रहति जनों के द्वारा भी क्षेम (भला) होता है। ज्ञानी अपने विज्ञान आदि केद्वारा, संस्कार बोध के द्वारा, धर्म आचरण से जगत का हित करते हैं। दान, अहिंसा, ज्ञान जैसे गुण ही स्वस्ति के गुण हैं। इन गुणों के संगठन से हमको स्वस्ति मिलती है।
            ददता, अघ्नता, जानता.. ऐसा कहते हुए वेद इन दिव्य स्वभावों को व्यक्त करता है ।
                        स्वस्तिदः स्वस्तिकृत् स्वस्ति स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः।
            मंगल देने वाला, मंगल कारक, मंगल स्वरूप, मंगल की रक्षा करने वाला, मंगल को आगे बढ़ाने वाला- इस प्रकार विष्णु का स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। हिंदू के संप्रदाय में स्वस्तिक चिन्ह की रचाना करना देखा जाता है। मुख्य रूप से उत्तर देश में हर शुभ कार्य में सिंदूर से या हल्दी से स्वस्तिक और पद्म को बनाते हैं। यह स्वस्तिक चिह्न - ओंकार का ही का रेखा रूप है। प्रणव स्वरूप गणपति का चिह्न के रूप में इसको लिखकर आराधना करना तंत्रों में भी दिखाई देता है। स्वस्ति भाव का यह संकेत है।
            स्वस्ति भाव का यह प्रणव चैतन्य दुनिया को स्वस्ति दे॥

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