(ग्रन्थ- “एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. २००-२०३)
परमात्मा राम नाम से अवतरित हुए हैं। उनका नाम कोई नया नहीं दिया गया है। सच कहें तो उस ने नया जन्म लिया है क्या? वह सदा स्थित है। शाश्वत, सच्चिदानंद तत्व के लीला कार्य करने के लिए अवतार लेने पर उनका नाम का भी अवतार हुआ है। कितना सुंदर नाम है! वेदों में इस दिव्य नाम मंत्र को तारक बताया गया है। र-अ-म इन तीन अक्षरों के इस नाम में अनिर्वचनीय शक्ति स्थित है। अतः सदाशिव इस नाम को सदा जाप करते हैं। ओंकार में स्थित तीन अक्षर ही रामनाम के तीन अक्षरों के रूप में विस्तारित हुए होंगे! अतः प्रणव का जो तारक (तारने वाला) होने का संकेत दिया गया, वही व्यवहार राम नाम का भी होता है।
हे सार सारतर तारक नाम
तुझे नाम देकर किसने पालन किया रे! (त्यागरायस्वामी)
राम शब्द का अर्थ है- ‘आनंद स्वरूप’। रमणीय दिखने वाला राम है। आनंद ही सुंदरता है। आनंदित करने वाले सभी लक्षण प्रभु में स्थित है। रूप, चरित्र, महिमा, तत्व, सब रमणीय है। सब रमणीयता का एक ही जगह स्थित होना बहुत ही विरल होता है। इस दुष्प्राप्य स्वरूप का ही राम नाम है। अतः राम नाम का स्मरण करने वाले के अन्दर सब रमणीय लक्षण आजाते हैं।
राम ने जिसे संहार किया, वह रावण है। रावण रोने का प्रतीक है। बहुत जोर से वह रोया और दूसरों को रुलाया। जब उसने कैलाश गिरि को उठाने का हिम्मत किया, तो शिवजी के पैर के उंगली दबाने से उस पहाड़ के नीचे उसके हाथ दब गए थे। तब वह भयानक रुदन करने लगा। उस रुदन या राव को सुनकर पशु-पक्षी भय से रोने लगे। अतः उसका नाम सार्थक हुआ। हमेशा किसी ना किसी कमी के कारण, या कामना को रखते हुए मन को जो जलाता है, वह अज्ञान का लक्षण ही रुदन है। उस स्वभाव का प्रतीक रावण है। उसके एकदम विरुद्ध राम है, वह आनंदस्वरूप है।
दस इंद्रियों में अज्ञान से पूरित होकर, दुखित होने वाले जीव की वेदना का अन्त करना केवल परमात्मा आनंद धाम को ही साध्य है। अतः राम दुःख नाशक है, रावण अन्तक है। राम तत्व का ध्यान ही आनंद प्राप्ति का हेतु है। विश्व के हेतु जो परम ज्योति है, वही सूर्य, चंद्र, अग्नियों के द्वारा जगत को अपना प्रकाश देरहा है- यही अपने शास्त्रों का विवरण है।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयते खिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
सूर्य में, चंद्र में, अग्नि में जो तेजस है, वह इस जगत को भासित करता है। वह मेरा (परमात्मा का) ही तेजस् है, ऐसा जानो-- यह श्रीकृष्ण का वचन है। विश्व का जो मूल है, तीन तेजस् का एक स्वरूप है, वही राम है। र- अग्नि बीज, अ- सूर्य बीज, म- चंद्र बीज है। अग्नि सूर्य चंद्र तीनों का बीज का एक स्वरूप का परम तेजस्वी श्री राम है। विश्व का कारण तेजो निधान है। अतः विश्व में सबको काम आने वाला वह विष्णु का नाम होगया। (श्रीराम राम रामेति)
हमारे अंदर वाक् अग्नि स्वरूप है; दृष्टि (शरीर) सूर्य स्वरूप है; मन चंद्र स्वरूप है। इन प्रकरणों में प्रसारित होने वाला आत्म चैतन्य ही श्री राम है। मूलाधार से सहस्रार तक जो सात चक्र हैं- उनके नीचे के चक्र अग्नि मंडल है; उसका ऊपर का सूर्यमंडल है; उसके ऊपर चंद्रमंडल है। पूरा हमारे अंदर कुंडलिनी इन तीन मंडलों का स्वरूप है। वह स्वरूप ही राम नाम है। अतः राम नाम का जप किया जाता है। हमारे अंदर सुगमता से कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने वाली शक्ति इसमें है। अर्थ के रीति से भी देखें शक्ति प्रकार भी देखें, तो इसमें बहुत सारे गहराइयाँ है। अतः राम नाम भव को तारने वाला नाम हो गया।
सारे योगी जन जिस परतत्व को पहुंचकर ब्रह्मानंद का अनुभव करते हैं, वही तत्व राम है- ऐसा शास्त्रों में बताया गया।
रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परब्रह्माभिधीयते ॥
योगी जन अपने साधनाओं के अंत में सिद्धि के रूप में जिस सच्चिदानंद तत्व में आनंदित होते हैं, वह परब्रह्म ही राम नाम के द्वारा बताया जा रहा है। सच्ची सुंदरता, व आनंद वह परमात्मा ही है ना! “आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (उपनिषद् वाक्य)
उस परब्रहम के ऐक्य को प्रसादित करने वाली शक्ति को धारण करने के कारण राम नाम मोक्षमंत्र के रूप में कीर्तित हुआ है। सत् चित् आनन्द-- यह तीन स्थितियां र-अ-म में हैं। इतना ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु रुद्र- यह तीन अक्षर एक होकर त्रिमूर्ति का स्वरूप परमात्मा राम होकर भासित होते हैं। अतः-
“या तो शिव हो या माधव हो
या कमलभव हो,
तुम्हें किस रुप में निर्णीत करे?”
ऐसा त्यागराय स्वामी ने गाया था। (तेलुगु कीर्तन)
त्यागराय ने इस राम नाम के तारक मंत्र को ‘सब मतों (धर्मपन्थों) को जो सहमत है, ऐसे नाम’ -के रूप में कीर्तन किया। राम नाम सच में वैसा ही तारक है। इसीलिए उसको प्राप्त करने के तुरंत बाद “तथ्य है, अब मैं पुनः नहीं जन्म लूंगा, तारक मंत्र मेरे चाहने से मिल गया” ऐसा परवश भावाभिभूत होकर रामदास ने गाया।
हमारे अंदर प्राण शक्ति को जागृत करने की महिमा रखने वाला यह नाम भारतीय का आत्मा है। आर्त जनोंको बचाने का सौजन्य, धूर्तों को मारने का वीरत्व- दोनों जिसके अंदर एक साथ दिखे वह सच्चा नायक श्रीराम है। नाम के ही अनुरूप उनके चालचलन और उनका व्यवहार (वर्तनी, और उनका चलना) बहुत सुंदर है। उनका चिंतन करने से, या स्मरण करने मात्र से शरीर पुलकित होता है, मन बहुत आनंद से परवश भाव को प्राप्त करता है। बहुत सारे महा पुरुष हैं! वाल्मीकि से प्रारंभ करके बहुत सारे ऋषिजन, बहुत सारे भाषाओं में, कवियों ने गायक-रचनाकारों ने श्रीराम का नाम गुणगान करते ही रहे हैं। राम नाम को जप कर राम की प्रतिमा को ध्यान करके राम की चरित्र का अध्ययन करने वाले को “सब राममय” ही है; “आनंदमय ही है॥
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