(ग्रन्थ- “एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री
षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. १०६)
जिसके रहने से सब रहते हैं, सब के रहने से या ना रहने से भी जो
रहता है, वही परमेश्वर तत्त्व है। हमारे अन्दर से व्यक्त
होने वाला हर चैतन्य उस अनंत शक्तिमान का प्रकटित रूप है। उसको ना समझपाने वाला
अज्ञान ही अहंकार है। उस अहंकार को छोड़कर उस अनंत चैतन्य के अंदर तादात्म्य
(तल्लीन) होजाना ही योग है।
एक
बार देवता राक्षस संहार करके उस विजय उत्साह को आनंद के साथ मना रहे थे। अग्नि
वायु इन्द्र इत्यादि देवता अपने प्रताप को बहुत घमंड के साथ दिखाने लगे थे। इतने
में एक महा तेज स्वरूप का उनके सामने साक्षात्कार हुआ। वे आश्चर्यचकित होकर देखने
लगे। अग्नि वायु इंद्र उसके पास गए तब उस स्वरूप ने कहा- “तुम लोगों को प्रताप को देखने के लिए
आया हूं।” ऐसा कहकर उनके सामने एक घास का तिनका रख दिया और
कहा, “अग्नि, तुम अपने प्रताप से अब इस
दर्भ को जलाकर दिखाओ।” बड़े-बड़े वनों को भी आसानी से जलाने
वाले अग्नि देव ने बहुत प्रयास करके भी छोटे से तिनके को नहीं जला पाया। उसके बाद
बड़े-बड़े पेड़ों को आसानी से निकाल बाहर करने वाले वायुदेव अपनी सारी शक्ति लगाकर
भी उस तिनके को थोड़ा भी नहीं हिला पाया। उसके बाद इंद्र ने विनय के साथ उस स्वरूप
को नमस्कार किया। तब जगदंबा का स्वरूप का साक्षात्कार हुआ। वह उमा देवी ने अपना
ईश्वरत्व स्वरूप समझाया कि ‘वह स्वयं साक्षात् परब्रह्म,
तेजःस्वरूप और ब्रह्मविद्या स्वरूप है।’ तब
अहंकार का नाश हुआ और अग्नि वायु इंद्र देवताओं ने उस परतत्व को जाना। यह कथा केन
उपनिषद में और कुछ पुराणों में है।
इस
गाथा को यदि सोचें तो, हम
जान लेते हैं कि - हमारे अंदर प्रकटित होने वाली इंद्रिय शक्तियां, विचार और चैतन्य का मूल आत्मशक्ति हमारे ही अंदर है, यह आत्म शक्ति हमारे परिमित रूप में दिखने वाला होने पर भी वह अखंड
अपरिमित और विश्व व्यापक है। उस अपरिमित तत्त्व को जानने से यह पता चलता है कि
हमारे द्वारा बोले जाने वाली बातें, अंदर के विचार, इंद्रिय चैतन्य- यह सारे वस्तु सर्वेश्वर के प्रकाश रूप है । तब हमारे मन
में परिमित अहंकार निकल जाते हैं। पवित्र समर्पण भाव आता है और इस विश्व को एक
चैतन्य के रूप में जान सकते हैं।
“मेरे अंदर सो रही बात को प्रेरित
करके मेरी आंखें इत्यादि इंद्रियों के द्वारा प्रसारित होने वाले चैतन्य स्वरूप,
हे नारायण, तुम को नमस्कार है।” ऐसा ध्रुव ने प्रार्थना की थी। यह सब कुछ हमारा ही सामर्थ्य है, ऐसा अहंकार ही सुख-दुख का पाप पुण्य का हेतु है। ऐसा ना हो कर हम को
निमित्त बना कर यह अखिल शक्तिमान व्यवहार कर रहा है। ऐसा पता चलने पर उस अनंत के
अपार करुणा भाव को जानकर नमस्कार करेंगे। यही भक्ति है, यही
ज्ञान है। ‘तुझे मुझे और सबको वही बल देता है’- ऐसा प्रह्लाद ने हिरण्यकशिपु से बोला था। वह यही सत्य है।
जब
‘सारे सामर्थ्य हमारे
खुद के हैं’- ऐसा सोचते हैं, तो लोभ
मोह इत्यादी कल्पित होजाते हैं, और ना करने वाली चीजें करने
लगते हैं और बहुत सारे दुःखों का अनुभव करते हैं। ऐसा ना करके- ‘मेरे इंद्रियों में, पंचभूतों में, सूर्य चंद्र में- सब जगह उस परमेश्वर का चैतन्य प्रसारित हो रहा है’-
ऐसी भावना को साधित करने वाला ‘अपने द्वारा
किए जाने वाले हर कर्म ईश्वर का प्रेरित है, ईश्वर समर्पित
है’- ऐसा जानकर उस जानकारी में अखंड आनंद को प्राप्त होता
है। “हे माँ, जैसे कोई सूर्य के तेज
ग्रहण करने वाले अग्नि को जलाकर, उस दीप से सूर्य को ही आरती
उतार रहे हो, या, चंद्रकांति से पिघलने
वाले चंद्रशिला के जलसे चंद्र को ही अंजलि दे रहे हो, या,
समुद्र के जलों से समुद्र को ही अर्घ्य दे रहे हो- तुम्हारे ही द्वारा दिए गए उस शक्ति से
तुम्हारी ही पूजा कर रहा हूं, स्तुति कर रहा हूँ” -ऐसा आदिशंकर ने सौन्दर्यलहरी में अंत में वर्णित किया है।
त्यागराज, अन्नमय्या, तुलसीदास,
सूरदास, मीराबाई, धूर्जटि,
पोतना- इत्यादि महापुरुषों ने अपनी प्रतिभा सामर्थ्य सारा कुछ ईश्वर
का वैभव वर्णन के लिए अंकित किया। और उस सर्वेश्वर चैतन्य के अंदर तन्मय भावना से
कैवल्य को प्राप्त किया। ‘देवताओं का आराधन करने के लिए
असमर्थ यह खेलकूद, गाना बजाना और सारी पढ़ाई, सब बेकार है’ ऐसा आदिभट्ला नारायणदास ने बोला था। ‘ईश्वर के द्वारा दिया हुआ चैतन्य ही हमारे अंदर आभास हो रहा है’ ऐसा जानना ही आध्यात्मिक साधनाओं का परम लक्ष्य है। सभी तरंगों में समुद्र
का ही चेतन प्रसारित हो रहा है ऐसा जाना ही अपरिमित योग है॥
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