Sunday, 8 April 2018

एष धर्मः सनातनः - 7. यह कलि काल है (अनूदित लेख)


(ग्रन्थ- एष धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्, पृ. २८३)

            क्षीर सागर मथन चल रहा था। पहले विष आया। सदाशिव ने उसको लेकर जगत की रक्षा की। उस के बाद के सारी संपत्तियों को देवता और दानव ने बाँट लिया। अंत में जो फल मिला वह अमृत था। उसको दोनों वर्गों ने समान रूप में चाहा। सात्विक देवता जबरदस्ती न कर पाए। असुर बहुत कठिनता से व्यवहार करने लगे। अमृत कलश के साथ प्रकटहुए धन्वंतरि के हाथ से कलश को छीन लिए। असरों के हस्त में अमृत का फँसना भूमि के लिए अरिष्ट था। देवताओं के समझ नहीं आया कि क्या करें।
            उस समय नारायण ने कलि पुरुष को बुलाया और कहा कि असुरों की बुद्धि को आक्रांत करो।भगवान की आज्ञा को शिरोधारण कर कलि ने राक्षसों के अंदर प्रवेश किया। आश्चर्य तब तक एक साथ काम करने वाले दैत्य बँट गए हमको अमृत चाहिएऐसी कामना से मुझे ही अमृत चाहिएऐसी दशा पर पहुंचे। इसी बीच नारायण ने मोहिनी का रूप लिया और उनके हाथ से अमृत को ले लिया। मोह माया जाल को बिछाकर देवताओं को अमृत दे दिया।
            इस कहानी में कली के बारे में जानने योग्य कुछ अंश हैं। जो साथ नहीं रहने देता- वह कलि है। भेदभाव बनाना कलि का मुख्य लक्षण है। जिस युग में यह लक्षण विस्तृत होकर रहता है, वह कलयुग है। यह स्वभाव अन्य युगों में कम परिणाम में होता है। जहां तहां सर उठाता है, पर उसके कारण (दूसरे युगों में) अधिक हानि नहीं होती। पर वह निरंतर विस्तृत व्यक्त होता है, तभी महाप्रमाद घटता है।
            कल्यन्ते कलहं कुर्वन्त्यस्मिन् इति कलिःकलह ही कलि है। दरिद्र का आधार कलह है। प्राचीन युग में अनाचार का अवकाश लेकर नल चक्रवर्ती के अंदर कलि प्रवेश कर गया था। किसी का कहना भी न मान कर नल जुए में सब कुछ हार गया। अंत में अपने साथ आई हुई पत्नी को भी छोड़ने का मन हुआ। वह कलि के ही प्रभाव से था।
            बिछड़ना और फूट डालना यही कली क लक्षण हैं। जगत में साथ रहने के लिए हेतु रहते हैं, फूट पड़ने के लिए भी है तो रहते हैं। इस विभाजक कारणों की परंपरा को बड़ा करने से ही कलियुग जन्म लेता है। भारत देश में कलि का स्वभाव दुर्योधन के रूप में प्रकट हुआ था। उसके बाद कलि पुरुष का ही काल प्रारंभ हुआ। अनाचार, दुराचार कलि पुरुष को बुलाते हैं। कलह करना, बिछड़ जाना- इसके फलस्वरूप रह जाते हैं। इसी से असुरी शक्तियां बढ़ जाती हैं।
            आजकल के समय में पूरे विश्व में हम यही सब देखते हैं। जाति, धर्म, वर्ग के नाम पर सब विभेद करते हैं। कोई यदि मिल जुलकर रहता भी हो तो क्षुद्र स्वार्थ के लिए वह केवल बनावटी मिलना ही है, पर सच में मिलकर रहना नहीं है। जो परिपालक हैं, उनके अंदर यह फूट डालने वाले लक्षण जन्म लेते हैं और विषमता के बिना जीने वाले विभिन्न प्रजा में जाति, वर्ण, और धर्म, प्रांत इत्यादि भाव को बढ़ाकर कलह की कल्पना करके बहुत अशांति और भ्रम का कारण होते हैं।
            कलि पुरुष का पालन इसी का नाम है। परस्पर अधिकता के लिए झगड़ते हुए, प्रयास करते हुए, सृष्टि में विषमता को बढ़ाना ही कली का पालन है। सब कलियुग है। क्या करें?’ ऐसे निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार वर्षा कल होने के बावजूद हम छाता धारण करके या रेनकोट पहनकर या घर में बैठकर वर्षा से बच जाते हैं, इसी प्रकार से भावना से भगवत ध्यान से दूसरों को जीने देते हुए यदि हम जीने का प्रयास करते हैं, तो थोड़ा बहुत सही चलने लगता है।
            शिव और केशव के भेद एक धर्म वालों को दोषदेना, अन्य धर्म वालों को नीचा दिखाते हुए, परिवर्तित होते हुए, धर्मांतरण कराते हुए, ‘हमारा ही बड़ा उन्नत सिद्धांत हैइस प्रकार झगड़ा करते हुए आक्रमण स्वभाविक चिंता की प्रवृत्ति-- यह सब कलि के दोष हैं। इनको मन से हटा कर आराम से रहना ही खुद के परे प्रगति देने वाला होगा और हम आगे कोई चलाएंगे

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