(ग्रन्थ- “एष
धर्मः सनातनः”- ग्रन्थकार- श्री षण्मुखशर्मा सामवेदम्,
पृ. ४१७-४२०)
विद्या से क्या प्राप्त किया जाए? इस प्रश्न का हम
तुरंत समाधान देते हैं- कि धन प्राप्त किया जाए।
विद्या
का धन ही परम प्रयोजन है- ऐसा सोचने के कारण विद्या भी व्यापार बन गया है। इससे वह
राजनीति वालों के हाथ में चलागया और पूरा क्षेत्र कलुषित हो गया। ऐसी व्यवस्था में
किसी को किस प्रकार के संस्कार मिलेंगे? अंततः माता-पिता भी
विद्या के द्वारा धन कमाने वाले यंत्रों के जैसे अपने बच्चों को बनाने में लगे हुए
हैं।
पर हमारे आर्ष धर्म (ऋषियों के द्वारा बनाया गया धर्म) ने विद्या के
लक्षणों का बहुत सुंदर उल्लेख किया है।
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मस्ततः सुखम् ॥
विद्या से विनय प्राप्त हो। विनय शब्द का अर्थ विनीत भाव, आज्ञाकारी होना, उसके साथ-साथ ज्ञान भी अर्थ है। जो
विज्ञानी होता है, वह विनीत होता है- ऐसा कहा जाता है।
विद्या से किस के साथ कैसे व्यवहार करें यह पता चलता है। व्यवहार ज्ञान को भी विनय
का नाम दिया है। यहां पर विनय शब्द का यह सारे अर्थ लिए जा सकते हैं। विद्या से
आज्ञाकारी भावना, विज्ञान, व्यवहार
ज्ञान- सब मिलते हैं। इसके द्वारा पात्रता, और उस पात्रता से
धन, उस धन से धर्म और धर्म द्वारा सुख प्राप्त होते हैं। इस
क्रम में औचित्य कितना महान है।
विद्या और धन के मध्य विनय, पात्रता और धन और सुख के
बीच में धर्म है। इस बीच वाले मुख्य विषयों को ना देखते हुए- विद्या से धन और धन
से सुख- ऐसा छलांग लगाने वाले व्यवहार से व्यक्तित्व को जो आवश्यक विनय, पात्रता और धर्म- इन मूल्यों को को छोड़ा जा रहा है।
इस के कारण व्यक्ति और समाज दोनों बलहीन होते जा रहे हैं। यहां विद्या का
लक्ष्य धन का लक्ष्य दोनों बताए गए हैं। धन के द्वारा धर्म को कमाना चाहिए। धर्म
के द्वारा सुख को कमाना चाहिए। क्या आपने देखा, कि इसमें
कितनी निशित भावना है?
यह एक श्लोक यदि विद्यालयों में विद्यार्थियों बताया जाए, तो मूल्यों वाली विद्या व्यवस्था को साधा जा सकता है। श्री वेंकटेश
करावलंब स्तोत्र में भक्त भगवान से प्रार्थना करते हुए - “लक्ष्मींश्च
देहि मम धर्मसमृद्धिहेतुं” ऐसी प्रार्थना करते है। अर्थात् ‘धर्म समृद्धि का कारण बनने वाला धन दिया जाए’- ऐसा
वेंकटेश भगवान की स्तुति करते है। धन के द्वारा धर्म को समृद्धि में कमाना चाहिए-
यह सनातन धर्म की बात इस स्तोत्र में है।
इसी कारण से कांची के महा स्वामी श्री श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती जी ने
इस प्रकार कहा- ‘धन के मांगने से पहले उसके अच्छे उपयोग करने
की बुद्धि मांगी जानी चाहिए।’
धर्म से पहले और बाद में उत्तम लक्षणों को रखा गया है। इन लक्षणों के
द्वारा व्यक्ति नियंत्रण साध्य होता है समाज में भद्र भावना रहती है। धर्म को
आचरित करने के लिए जिनके पास उपायुक्त साधन नहीं हैं, ऐसे
बहुत सारे लोग असहाय हो जाते हैं। पर धर्माचरण के लिए उपयुक्त संपादन का होना बहुत
सौभाग्य की बात होती है। उस सौभाग्य को उपयोग करना ही धन को धर्म के लिए खर्च करने
का तात्पर्य होता है। धन के द्वारा जो सुख मिलता है उससे कहीं अधिक धर्म के द्वारा
मिलने वाले सुख और समृद्धि और शांति होते हैं।
जीवन में मिलने वाले सुखों से दूर रहो- ऐसी व्यर्थ विरक्ति की भावना को
हमारे हमारे धर्म ने प्रबोध नहीं किया। ‘आराम से जियो,
आनंद से जियो’ यही बताया है। “पश्येम शरदः शतम्, जीवेम शरदः शतम् नंदाम शरदः शतम्”
अर्थात् ‘सौ साल देखते हुए, सुनते हुए, आराम से आनंद से जियें’- ऐसा वेद मंत्र उत्साह से प्राण शक्ति को फूंकते हैं।
पर इस आनंद का अर्थवान होना आवश्यक है। किसी भी व्यक्ति को उससे नष्ट नहीं
होना चाहिए। इस प्रकार का अर्थवान समझ को जगाने वाली ही विद्या होती है। इस समझ के
साथ कमाने वाला ही धन होता है। उस लक्ष्य के लिए विनियोग होना ही उसका उद्देश्य
है। वही धर्म है। उस विनियोग के द्वारा मिलने वाले आनंद में ही जीवन सार्थक होता
है।
इसीलिए हमारे ग्रंथों में बड़ों ने (एक आचरण अवश्य किया है कि) किसी के घर
जाने पर उस गृहस्थी को बात करते हुए पहले पूछने वाली बात होती थी, कि ‘क्या तुम्हारा धर्म सही चल रहा है?’ उसके बाद ही भौतिक कुशलता और सब कुछ! ऋषि जब दिखते तो ‘यज्ञ, तपस्या निर्विघ्न चल रही है ना?’ ऐसा पूछते हैं। राजा लोग मिलते तो ‘प्रजापालन
निराघात चल रही है ना?’ ऐसा पूछते हैं।
समाज के शाश्वत सौख्य के लिए तरसने वाली बुद्धिवाले इस प्रकार सोचते हैं।
एक ही श्लोक में व्यक्ति का जीवन मार्ग निर्देश इतनी समग्रता से बोधित करने वाले
हमारे सनातन धर्म को नमस्कार करना ही पड़ेगा। विद्या को प्राधान्य देने वाला
गुरुपीठ है। हमारा देश भौतिक सुखों को भी लक्ष्य ना करके अरण्य में वास करते हुए
जीवन को पूरा ही ज्ञान समुपार्जन के लिए खर्च करने वाले महातपस्वी जनों ने- “विद्यया अमृतम् अश्नुते” अर्थात् ‘विद्या द्वारा अमृतत्व को प्राप्त हो सकते हैं’- ऐसा
उपबोध किया है।
विद्याभ्यास के अंत में गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करते समय ब्रह्मचारी से “स्वाध्यायात् मा प्रमदितव्यम्” ऐसा उपदेश देता है
गुरु। इसका अर्थ है- ‘जीवन में निरंतर अध्ययन करते रहो,
कभी चूकना मत’। निरंतर अध्ययन द्वारा निरंतर
धर्म, और धर्म द्वारा निरन्तर सुख बढ़ते हैं। सत्य की कामना
से सच्चे आनंद को प्राप्त करने के लिए विद्या धन के पीछे जो अच्छे लक्षण हैं
उन्हें प्राप्त करना चाहिए॥
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